
तनहा है मन ना जाने कब से,
जाने क्यो रूठा बैठा रेहता है सबसे।
बस सुनता रेहता है आती जाती हवा मैं सुरों को,
और मुस्कुराता है अपने आप पर की ये मैं कहा आगया। जिंदगी से चाहता है कुछ पर कभी कहता नही।
डरता है उस ना से जो जिंदगी ने अब तक की नही.
तरसता है उस हाँ को जो जिंदगी ने अब तक दी नही।
अजीब से कशमकश है की वो क्या करे,
किसीको क्या फरक पड़ेगा की मेरा ये मन जिये या मरे।
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जिदनेश
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