ये संकुचित शब्द मेरे, यथार्त के सच को ना पाते।
दिल ही दिल मैं तिलमिलाते, स्वप्न को संज्ञा बनाते।
ये भूतपूर्व दर्द मेरे, आज भी भुलाये ना जाते।
इतना दर्द ना छुपाओ उस दिल मैं की वो सेहेम जाऐ, बतादो उसे इसके पेहले की यह साँस थम जाऐ।
दिल की गलती है अब वही सयाय दिखाए,
सिर्फ़ कहने से सुकून नही मन है इन्हे दफनाया जाए।
कुछ अनकही सी है मैं भी, मैं चुप रहू वो समझ पाए।
क्यूंकि लब भी सिहर उठते है, इतना की लव्ज़ दोहरा ना पाए।
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